जबलपुर,इंफर्मेशन टेक्नॉलाजी में इंजिनियरिंग की डिग्री प्राप्त करने के बाद दो साल कार्पोरेट की नौकरी की और बीच के कुछ वर्ष खुद का कोचिंग इंस्टिट्यूट शुरू कर राज्य शासन की आकांक्षा योजना से जुड़कर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रों को जेईई, नीट एवं क्लेट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं की तैयारी कराई। लेकिन कोविड महामारी उनके जीवन में महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई और आज उनकी पहचान मत्स्य पालन के क्षेत्र में एक सफल उद्यमी के रूप में होने लगी है। हम बात कर रहे हैं आईटी पेशेवर से मत्स्य पालन के क्षेत्र में नवाचारों को अपनाने वाली भाविनी झा की। महिला सशक्तिकरण की मिसाल बनी भाविनी अकेले अपने बलबूते पर जबलपुर विकासखण्ड के
ग्राम हिनोतिया टोला में बायो फ्लॉक तकनीकी से मत्स्य पालन कर रही हैं और उन उद्यमियों के लिये उदाहरण बन गई हैं, जिनमें जोखिम उठाने की क्षमता हो और लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये कठोर परिश्रम करने का जज्बा हो। भाविनी ने वर्ष 2007 में शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेज जबलपुर से इंफर्मेशन टेक्नॉलॉजी में इंजीनियरिंग
करने के बाद एक मल्टी नेशनल कम्पनी में सॉफ्टवेयर डेवलपर के तौर पर काम किया। लेकिन दो वर्ष बाद कार्पोरेट कल्चर को छोड़कर वे वापस जबलपुर आ गईं और शिक्षा के क्षेत्र को अपनाकर राज्य शासन की आकांक्षा योजना से जुड़ गईं। कोविड के दौरान जब सब कुछ थम गया, भाविनी ने भी सेवा क्षेत्र से हटकर फूड प्रोडक्शन की ओर रुख किया और मत्स्य पालन के क्षेत्र को अपनाने का निर्णय लिया। भाविनी ने मछली पालन में देश के प्रमुख अनुसंधान संस्थान भुवनेश्वर स्थित केंद्रीय मीठाजल जलीय संस्थान (सीआईएफए) तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के ही मुम्बई स्थित केंद्रीय मत्स्य शिक्षा संस्थान (सीआईएफई) में तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त किया। इसके बाद उन्होंने हिनोतिया टोला में करीब 5 एकड़ जमीन ली और दो तालाब (बायो फ्लॉक पोंड) बनाकर पंगासियस मछली का उत्पादन शुरू किया। इसमें उन्हें राज्य शासन के मत्स्य पालन विभाग से पूरा सहयोग और मार्गदर्शन मिला। शुरुआती सफलता से उत्साहित होकर भाविनी ने हिनोतिया टोला में ही दो बायो फ्लॉक पॉन्ड (तालाब) और बनाये। इसके लिये मत्स्य पालन विभाग द्वारा संचालित प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से उन्हें
साठ प्रतिशत अनुदान भी मिला। उन्होंने खुद का नर्सरी पोंड भी यहां स्थापित किया है। वे मंडला जिले के बोकर स्थित प्रोजेक्ट में कम्पोजिट कल्चर के जरिये भी मछली का उत्पादन ले रही हैं।भाविनी बताती हैं कि हिनोतिया टोला के चारों बायो फ्लॉक पोंड की वार्षिक उत्पादन क्षमता करीब 80 टन है। उनके तालाबों से निकली पँगासियस प्रजाति की मछली उच्च गुणवत्ता की, प्रोटीन युक्त और पूरी तरह केमिकल मुक्त होती हैं। स्थानीय बाजार के साथ-साथ जबलपुर के आसपास के जिलों में इसकी
अच्छी मांग है। इसके अलावा अन्य राज्यों के व्यापारी भी इसमें रुचि ले रहे हैं।
कृषक परिवार से जुड़ी भाविनी मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में मिली इस सफलता में शासन से मिले सहयोग की बड़ी भूमिका बताती हैं। तीन बच्चों की माँ भाविनी अपनी कामयाबी का श्रेय माता-पिता के संस्कारों और पति से मिल रहे समर्थन को भी देती हैं।
नारी सशक्तिकरण की मिसाल बनी भाविनी मत्स्य पालन में नवाचारों को अपनाकर बनी सफल उद्यमी
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