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ढीमरखेड़ा और बड़वारा क्षेत्र के करीब 300 किसानों ने किया हल्दी,अदरक,अश्वगंधा और तुलसी की खेती डाबर इंडिया लिमिटेड और सुहाना मसाला जैसी कई बड़ी कंपनियों ने उत्पादों को खरीदने में दिखाई रूचि

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कटनी  – प्राकृतिक, औषधीय और बागवानी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के संबंध में कलेक्टर श्री आशीष तिवारी द्वारा अधिकारियों को दिए निर्देशों के बाद जिले के ढीमरखेड़ा और बडवारा क्षेत्र के करीब 300 किसानों ने खेती-किसानी के नए तरीकों को अपनाकर हल्दी,अदरक, अश्वगंधा और तुलसी की खेती में हाथ आजमाया है। इनकी अच्छी खासी मात्रा में उपज होने की संभावना है। डाबर इंडिया लिमिटेड और महाराष्ट्र बेस्ड सुहाना मसाला जैसी कई बड़ी कंपनियां जिले के इन उत्पादों को खरीदने के प्रति दिलचस्पी जाहिर की है।किसानों को इन उत्पादों का बेहतर दाम दिलाने और अन्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए एफपीओ संगम बीडी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई गई है।जो नीमच मंडी,डाबर इंडिया लिमिटेड और सुहाना मसाला जैसी प्रतिष्ठित कंपनियों के प्रबंधन से यहां के उत्पादों को अच्छी कीमत देने के संबंध में लगातार बातचीत कर रहे हैं।पर्यावरणविद् एवं मानव जीवन विकास समिति के सचिव निर्भय सिंह ने बताया कि राज्य शासन के कृषि विभाग के आत्मा, नाबार्ड के नानबाडी और मानव जीवन विकास समिति द्वारा 300 कृषकों को अश्वगंधा,अदरक,हल्दी और तुलसी के निःशुल्क बीज देकर खेती के लिए प्रोत्साहित किया। बीते साल भी किसानों को अश्वगंधा के निःशुल्क बीज दिए गए थे और किसानों ने करीब 25 एकड़ में अश्वगंधा की खेती भी की थी।इसे नीमच क़ृषि उपज मंडी में 25 हजार रुपए में बेंचा गया। जिसका सीधा लाभ उत्पादक किसानों को हुआ।एक अनुमान के मुताबिक इन सभी किसानों को मिलाकर करीब 500 से 600 क्विंटल अदरक, 1500 से 1600 क्विंटल हल्दी और करीब 100 किलो तक तुलसी की उपज होना संभावित है। इसके अलावा अश्वगंधा की भी इस साल अच्छी उपज है। पर्यावरणविद् श्री सिंह ने बताया कि नाबार्ड के टीडीएफ फंड के अंतर्गत नानबाड़ी परियोजना के तहत ढीमरखेड़ा विकासखंड के 8 गांव  क्रमशः कोठी, हर्रई, सगौना, सिवनी, दैगवां, दियागढ़, उमरपानी और छाहर सहित बडवारा के गांवों में भी अश्वगंधा, हल्दी,अदरक और तुलसी की खेती की जा रही है।सचिव निर्भय सिंह बताते हैं कि परंपरागत खेती से हटकर अश्वगंधा, हल्दी,अदरक और तुलसी की खेती के लिए शुरुआती दौर में ग्रामीणों और किसानों के मन में हिचक और कई तरह की आशंकाएं रहीं। लेकिन इस साल करके देख लेते है, अगर सफलता नहीं मिली तो अगले साल परंपरागत खेती ही करेंगे। लेकिन वही किसान अब कह रहे हैं कि खेती के नये तरीकों को अपनाने का अनुभव शानदार रहा है। अब आगे साल भी हम सब और बड़े रकवे में इसकी खेती करेंगे।


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