जबलपुर, रासायनिक खेती की बढ़ती लागत के बीच प्राकृतिक खेती किसानों के लिए विकल्प बनकर उभर रही है।
जबलपुर जिले के कुंडम विकासखंड के ग्राम पंचायत बरखेड़ा निवासी दुर्गेश झारिया पिछले दो वर्षों से
प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे तीन एकड़ में धान, कोदो, कुटकी, बाजरा और ज्वार जैसी फसलें उगा रहे हैं।
इन फसलों में रासायनिक कीटनाशकों के बजाय प्राकृतिक तरीके से तैयार घोल और जैविक दवाइयों का
उपयोग करते हैं। उनका कहना है कि इस पद्धति से खेती की लागत कम करने और प्राकृतिक तरीकों से
फसलों की सुरक्षा करने का प्रयास कर रहे हैं। वे खेती से एक सीजन में करीब 35 से 40 हजार रुपए की
कमाई कर लेते हैं।
बीजामृत, नीमास्त्र और अग्निअस्त्र का करते हैं उपयोग
दुर्गेश झारिया ने बताया कि वे प्राकृतिक खेती में बीजामृत, नीमास्त्र और अग्निअस्त्र जैसे प्राकृतिक घोल
तैयार कर फसलों में इस्तेमाल करते हैं। इनका उद्देश्य फसलों की सुरक्षा के लिए प्राकृतिक विकल्प
अपनाना और खेती पर होने वाले खर्च को कम करना है। वे पारंपरिक फसलों की खेती में इन तरीकों को
अपनाकर दूसरे किसानों को भी प्राकृतिक खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
25 किसानों का बनाया समूहप्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए दुर्गेश झारिया ने 25 किसानों का समूह बनाया है। समूह कीमहिलाएं भी इस पद्धति को अपनाने और दूसरे किसानों को इसके लिए प्रेरित करने में सहयोग कर रही
हैं। आत्मा परियोजना के तहत कृषि विभाग से मिली 7 हजार रुपए की सहायता से उन्होंने बीआरसी
तैयार किया है। इस केंद्र के माध्यम से प्राकृतिक खेती में उपयोग होने वाली सामग्री और विभिन्न घोल
तैयार किए जाते हैं, जिससे किसानों को इस पद्धति को अपनाने में मदद मिल सके।
125 किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए किया प्रेरित दुर्गेश झारिया अब तक करीब 125 किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर चुके हैं। वे किसानों को प्राकृतिक खेती के तरीकों और कम लागत में खेती करने की संभावनाओं के बारे में जानकारी
देते हैं।
