जबलपुर,हौसले बुलंद हों तो कठिन लक्ष्य को भी पाना आसान हो जाता है। ऐसा ही कर दिखाया है इंजिनियरिंग के छात्र तन्मय दास ने। मात्र बीस वर्ष के तन्मय ने कृषि में नवाचारों को अपनाकर उन युवाओं के सामने प्रेरक उदाहरण प्रस्तुत किया है जो पुश्तैनी खेती को छोड़कर नौकरी की ओर रुख कर रहे हैं। जबलपुर इंजिनियरिंग कॉलेज के इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र तन्मय की पारिवारिक पृष्ठभूमि शिक्षा से जुड़ी है। तन्मय के पिता विजय नगर में स्कूल संचालित कर रहे हैं और माँ उस
स्कूल की प्राचार्य हैं। बड़ा भाई आईआईटी रोपड़ से इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग से बीटेक करने के बाद नागपुर में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहा है।
तन्मय को हाल ही में ऊर्जा क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित कम्पनी से 24 लाख रुपये का जॉब का ऑफर भी मिला, लेकिन इस ऑफर को स्वीकार करने की बजाय उसने कृषि के क्षेत्र में ही कॅरियर बनाने का निर्णय लिया। विजय नगर स्थित अपने घर से गिर नस्ल की गाय पालकर की उसने इसकी शुरुआत की। बेशक माता-पिता का इसमें पूरा सहयोग रहा और आज भी वे इस कार्य मे उसका हाथ बंटा रहे हैं। करीब दो वर्ष पहले तन्मय ने पाटन विकासखण्ड के ग्राम लम्हेटा में साढ़े तीन एकड़ जमीन ली और
एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाकर फसलों के साथ पशुपालन, मुर्गी पालन, बकरी पालन, मत्स्य पालन एवं बत्तख पालन को जोड़कर हर माह लगभग 80 हजार रुपये की आय अर्जित कर रहे हैं। तन्मय प्रतिदिन कॉलेज के बाद अपने खेत जाते हैं।
तन्मय ने बताया कि पारंपरिक खेती की बढ़ती लागात एवं अनिश्चितता को देखते हुए एकीकृत कृषि प्रणाली उसके लिए सुरक्षा कवच साबित हो रही है। फसलों के साथ साथ मुर्गीपालन, पशुपालन, मत्स्य पालन, बकरीपालन जैसे घटकों को एक साथ जोड़ने पर एक घटक का अपशिष्ट दूसरे घटक के लिए संसाधन का कार्य करता है। तन्मय ने अपनी कृषि भूमि पर 10 फुट गहरा छोटा तालाब बनाया है। इस तालाब में रोहू, कतला प्रजाति
की मछली के साथ बत्तख एवं हंस का पालन किया जा रहा है। तालाब के ऊपर बने पिंजरे के अंदर तीतर एवं ऊपर कबूतर पाले गये हैं। तालाब में बत्तख एवं हंस की बीट मछलियों के आहार के रूप में उपयोग में आ रही है और इनसे बचे हुए अपशिष्ट जो पानी मिल में जाते है का इस्तेमाल फसल की सिंचाई केजरिये किया जाता है। तन्मय ने बताया कि तालाब में बत्तख एवं हंस के तैरने से पानी मे ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ जाती है जिससे मछलियों का आकार और वजन बढ़ जाता है। तन्मय ने एक एकड़ में गौशाला भी बनाई है। इस गौशाला में गुजरात से लाई गई गिर गाय के गोबर एवं गोमूत्र का उपयोग जैविक खाद बनाने में किया जा रहा है और दूध से दही, मठा एवं घी बनता है।
इसकी बाजार में अच्छी कीमत मिल रही है। हर रविवार को कृषि उपज मंडी जबलपुर में आयोजित किये जा रहे जैविक हाट में तन्मय इन उत्पादों का स्टॉल भी लगा रहे हैं।
तन्मय करीब ढाई एकड़ क्षेत्र में जैविक पद्धति से गेहूँ और धान की फसल ले रहे हैं। एकीकृत कृषि प्रणाली अपनाने से उसके खेत धान का उत्पादन औसत से अधिक आया है। धान की कटाई के बाद उसके अवशेष (पराली) को खेत में मिलाकर सीधे गेंहू की बोनी करने से किसी भी तरह की रासायनिक उर्वरकों की निर्भरता भी खत्म हो गई।
कृषि में तन्मय द्वारा अपनाये गये इन नवाचारों का अनुविभागीय कृषि अधिकारी पाटन डॉ इंदिरा त्रिपाठी ने आज अपने सहयोगी कृषि अधिकारियों के साथ किया। उन्होंने क्षेत्र के किसानों से तन्मय के कृषि प्रक्षेत्र का भ्रमण करने और एकीकृत कृषि प्रणाली को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे कृषिलागत में कमी आयेगी और निरंतर आय होगी तथा मिट्टी की गुणवत्ता मे सुधार आने के साथ ही
पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा मिलेगा|
कृषि में नवाचारों को अपनाकर बीस वर्ष के तन्मय ने युवाओं को दिखाई नई राह.
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