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पारंपरिक खेती से नवाचार की ओर बढ़े कदम, 450 किसानों ने रचा बदलाव का नया अध्याय हल्दी, अदरक, अश्वगंधा, तुलसी और चिया बनीं नई उम्मीद, प्रतिष्ठित कंपनियों ने भी खरीद में दिखाई रुचि डाबर इंडिया लिमिटेड और सुहाना मसाला जैसी कंपनियों की उत्पाद खरीदने में रुचि से बढ़ा किसानों का उत्साह

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कटनी – खेत वही हैं, किसान वही हैं, लेकिन अब खेती का अंदाज बदल रहा है। जिन खेतों में कभी परंपरागत फसलों की ही उम्मीद बोई जाती थी, वहां अब हल्दी की पीली रंगत, अदरक की खुशबू, अश्वगंधा की जड़ें, तुलसी की हरियाली और चिया के छोटे-छोटे बीज भविष्य की नई संभावनाओं का संदेश दे रहे हैं। ढीमरखेड़ा और बड़वारा क्षेत्र के 450 से अधिक आदिवासी किसानों ने करीब सवा सौ एकड़ में पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर प्राकृतिक, औषधीय और मसाला फसलों को अपनाया है। लगातार तीसरे वर्ष आगे बढ़ रही यह पहल अब खेतों में फसल बदलने से कहीं आगे निकलकर किसानों की सोच में बदलाव की कहानी बन गई है।कलेक्टर श्री आशीष तिवारी द्वारा प्राकृतिक, औषधीय और बागवानी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कृषि और उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों को दिए गए निर्देशों के बाद किसानों को नई फसलों से जोड़ने के गंभीर प्रयास किए गए। शुरुआत में नई फसल, नई तकनीक और बाजार को लेकर किसानों के मन में कई सवाल थे, लेकिन पर्यावरणविद् श्री निर्भय सिंह के सद्प्रयासों आदिवासी किसानों के मन से धीरे-धीरे तमाम आशंकाओं को भरोसे में बदल दिया।

एक खेत की सफलता बनी दूसरे खेत की उम्मीद

पर्यावरणविद् एवं मानव जीवन विकास समिति के सचिव श्री निर्भय सिंह बताते हैं कि पिछले वर्ष किसानों को अश्वगंधा के निःशुल्क बीज उपलब्ध कराए गए थे। करीब 25 एकड़ में अश्वगंधा की खेती हुई। तैयार उपज नीमच कृषि उपज मंडी में 25 हजार रुपये में बेची गई और इसका सीधा लाभ उत्पादक किसानों को मिला। यह अनुभव किसानों के लिए एक तरह से रास्ता दिखाने वाला साबित हुआ। इस वर्ष नई फसलों का रकबा और किसानों की संख्या दोनों बढ़ी है।इस वर्ष 175 किसान हल्दी, 100-100 किसान अश्वगंधा और तुलसी तथा 75 आदिवासी किसान अदरक की खेती कर रहे हैं। वहीं 15 किसानों ने करीब आधा एकड़ में चिया की खेती की है। अनुमान के मुताबिक इन खेतों से करीब 700 से 800 क्विंटल अदरक, 2500 से 3000 क्विंटल हल्दी और लगभग 750 किलोग्राम तुलसी की उपज संभावित है। अश्वगंधा की भी इस वर्ष अच्छी उपज होने की उम्मीद है।

अब फसल खेत से बाजार तक पहुंचाने की तैयारी

नई खेती के साथ किसानों के सामने उपज के बेहतर बाजार की चुनौती भी रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए एफपीओ संगमबीडी फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी बनाई गई है। एफपीओ किसानों की उपज को बेहतर मूल्य दिलाने के लिए नीमच कृषि उपज मंडी, डाबर इंडिया लिमिटेड और महाराष्ट्र बेस्ड सुहाना मसाला सहित अन्य प्रतिष्ठित कंपनियों और बड़े औद्योगिक संस्थानों से लगातार बातचीत कर रहा है। इन कंपनियों ने जिले में उत्पादित फसलों को खरीदने में रुचि दिखाई है।

आठ गांवों से शुरू हुई राह, अब बड़वारा तक पहुंची

नाबार्ड के टीडीएफ फंड के अंतर्गत नानबाड़ी परियोजना के तहत ढीमरखेड़ा विकासखंड के कोठी, हर्रई, सगौना, सिवनी, दैगवां, दियागढ़, उमरपानी और छाहर , भलवारा, मेर, पहरुआ, कटारिया, खदंवारा, बांध, भमका, महगवां, सर्रा, तिलमन और बिजौरी गांवों के किसान मसाला एवं औषधीय फसलों की खेती से जुड़े हैं‌।इसके अलावा बड़वारा क्षेत्र के भदौरा, पथवारी, विलायतकलां, पठरा, भादावर, जमुनियां, बिजौरी, भमराड, चादन और चपहनी गांवों में भी किसान इन फसलों की खेती कर रहे हैं।इन गांवों में अश्वगंधा, हल्दी, अदरक और तुलसी की खेती की जा रही है। राज्य शासन के कृषि विभाग की आत्मा, नाबार्ड के नानबाड़ी कार्यक्रम और मानव जीवन विकास समिति द्वारा किसानों को निःशुल्क बीज देकर इस पहल से जोड़ा गया है।श्री निर्भय सिंह बताते हैं कि शुरुआती दौर में किसानों के मन में नई फसलों को लेकर हिचक थी, लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। एक किसान की सफलता दूसरे किसान के लिए प्रेरणा बन रही है और एक खेत में आजमाया गया प्रयोग अगले खेत तक पहुंच रहा है। यही वजह है कि ढीमरखेड़ा और बड़वारा में साल-दर-साल मसाला और औषधीय फसलों का रकबा बढ़ रहा है।इन खेतों में उग रही हल्दी, अदरक, अश्वगंधा, तुलसी और चिया केवल फसलें नहीं हैं। ये उस बदलाव के प्रतीक हैं, जिसमें किसान अब केवल उपज पैदा करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि अपनी उपज के लिए बेहतर बाजार और बेहतर मूल्य की संभावनाएं भी तलाश रहा है। खेतों में हो रहा यह बदलाव आने वाले समय में कटनी के इन ग्रामीण अंचलों की कृषि तस्वीर को एक नई दिशा मिलेगी।

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